रायपुरः जिन लोगों का देहांत दोनों पक्षों की किसी त्रयोदशी तिथि हो हुआ है, उनका श्राद्ध आज किया जाता है। त्रयोदशी श्राद्ध को तेरस श्राद्ध और बालभोलनी तेरस के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन मृत बच्चों का श्राद्ध किया जाता है। जिन बालकों की आयु दो वर्ष या उससे अधिक होती इस दिन उनका श्राद्ध किया जाता है।

श्राद्ध को सम्पन्न करने के लिए कुतुप, रौहिण आदि मुहूर्त शुभ मुहूर्त माने गये हैं। अपराह्न काल समाप्त होने तक श्राद्ध सम्बन्धी अनुष्ठान सम्पन्न कर लेने चाहिये। श्राद्ध के अन्त में तर्पण किया जाता है। सबसे पहले श्राद्ध के लिए सामग्री कुशा, कुशा का आसन, काली तिल, गंगा जल, जनेऊ, तांबे का बर्तन, जौ, सुपारी, कच्चा दूध इक्ट्ठा कर लें।

स्वयं को पवित्र करने के लिए खुद पर गंगा जल छिड़कें। उसके उपरांत कुशा को अनामिका (रिंग फिंगर) में बांधते हैं। जनेऊ धारण करें, ताम्बे के पात्र में फूल, कच्चा दूध, जल ले अपना आसान पूर्व पश्चिम में रखे और कुशा का मुख पूर्व दिशा में रखे हाथों में चावल एवं सुपारी लेकर भगवान का मनन करे उनका आव्हान करें।

दक्षिण दिशा में मुख कर पितरों का आव्हान करें, इसके लिए हाथ में काली तिल रखें। अपने गोत्र का उच्चारण करें साथ ही जिसके लिए श्राद्ध विधि कर रहे हैं, उनके गोत्र एवं नाम का उच्चारण करें और तीन बार तर्पण विधि पूरी करें अगर नाम ज्ञात न हो तो भगवान का नाम लेकर तर्पण विधि करें।

तर्पण के बाद धूप डालने के लिए कंडा ले, उसमें गुड़ एवं घी डालें। बनाये गए भोजन का एक भाग धूप में दे और एक भाग गाय, कुत्ते, कौए, पीपल एवं देवताओं के लिए निकाले। इस प्रकार भोजन की आहुति के साथ विधि पूरी की जाती है।

डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी प्रचलित मान्यताओं, धर्मग्रंथों और ज्योतिष शास्त्र के आधार पर ज्योतिषाचार्य डॉ. अंजु सिंह परिहार का निजी आकलन है। आप उनसे मोबाइल नंबर 9285303900 पर संपर्क कर सकते हैं। सलाह पर अमल करने से पहले उनकी राय जरूर लें।